30 एसकेएन 251 शहर से सेमरियावां पहुचे लोग बड़ी मशक्कत व सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर पहुचे थे गांव गांव पहुचे पर लोगों ने सुनाई दिल दहलाने वाली कहानी

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30 एसकेएन 251 शहर से सेमरियावां पहुचे लोग बड़ी मशक्कत व सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर पहुचे थे गांव गांव पहुचे पर लोगों ने सुनाई दिल दहलाने वाली कहानी
  • लोहरौली। माता–पिता व बीबी बच्चों के पालने के लिए तप्पा उजियार के हजारों लोग दूर दराज शहर में मेहनत मजदूरी करने जाते है। एक छोटे से कोरोना वायरस ने परिवारों की जहां रोटी रोजी छिन गई वही युवाओं का जान बचाना मुश्किल हो गया। एक बार फिर से परिवार में पहुचने के लिए रोजी रोट कामने गए शहर से लोगों को काफी दिक्कतो को समाना करन पड़ा। सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर घर पहुचे। मगर गांव के पहले बार्डर पर गांव के मुख्यिा ने रोक लिया। परिवार के मिलने से पहले ही प्राथमिक विद्यालय में बंद कर दिया।

सचित्र: वाह रे कोरोना:– शहर छोड़ गांव पहुचे नही मिला गांव में ठिकाना

 30 एसकेएन 251 शहर से सेमरियावां पहुचे लोग

 बड़ी मशक्कत व सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर पहुचे थे गांव

गांव पहुचे पर लोगों ने सुनाई दिल दहलाने वाली कहानी

लोहरौली। माता–पिता व बीबी बच्चों के पालने के लिए तप्पा उजियार के हजारों लोग दूर दराज शहर में मेहनत मजदूरी करने जाते है। एक छोटे से कोरोना वायरस ने परिवारों की जहां रोटी रोजी छिन गई वही युवाओं का जान बचाना मुश्किल हो गया।

एक बार फिर से परिवार में पहुचने के लिए रोजी रोट कामने गए शहर से लोगों को काफी दिक्कतो को समाना करन पड़ा। सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर घर पहुचे। मगर गांव के पहले बार्डर पर गांव के मुख्यिा ने रोक लिया। परिवार के मिलने से पहले ही प्राथमिक विद्यालय में बंद कर दिया। माता–पिता व बीबी बच्चों से मिलने की हसरत दिल में ही रह गई।

सेमरियावां में शहर से पहुचे रमेश, लालू राम जग, राम जग, सपना, जोगिन्दर, रजापुर सरैया में पहुचे, सीता राम, राधेश्याम, अजया, घरभरन 550 लोगों की कहानी है। लाकडाउन के बाद कई फैक्ट्री व कारखाने बंद हो गए। फैक्ट्री व कारखाने बंद होने से हम लोग भूखमरी के कगार पर पहुच गए। कई दिन भूखे प्यासे रहना पड़ा। कई दिन भूखे प्यासे रहने से बेहतर समझा था कि हम लोग गांव में परिवार के पास पहुच जाएं।

पैदल कानपुर, दिल्ली, आगरा, मुम्बाई जैसे शहरों से पहुचे लोग के लिए यह क्या अपना घर भी इन लोगों के लिए पराया हो गया। घर में घुसने को नही मिला। गांव में पहुचने से पहले ही स्कूलों में कैद कर दिया गया है। माता–पिता व बीबी बच्चों से मिलने की हसरत पूरी नही हो पाई।

इंसर्ट अब तो वायरस का डर लगने लगा

शहर से गांव में पहुचे युवाओं ने बताया कि रास्ते में एक ही धुन थी किसी तरह गांव बीबी बच्चों में पहुच जाएं। शहर से गांव आने में एक बार भी कोरोना का डर नही लगा। अब प्राथमिक विद्यालय में कैद होने के बाद कोरोना वायरस का डर सताने लगा है।

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