यूं ही नहीं बनी परम्पराएं आये जाने इनके वैज्ञनिक कारण तेजस्विता उपाध्याय,मऊ।

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यूं ही नहीं बनी परम्पराएं आये जाने इनके वैज्ञनिक
  • आज के इस मॉडर्न समाज में वेदों में लिखी परम्पराएं और जन्म जनमान्तर से चली आ रही सभ्यता को एक झटके में अन्धविश्वास का नाम दे दिया जाता है। आज के समय में कई स्नातकधारी भी परम्पराओं के पिछे की असल वजह बिना जाने उसे निराधार कह देते है। फिर यही स्नातकधारी किसी विद्वान् के समक्ष पढ़ें लिखे गवांर की भांती परिचित होते है। किसी विषय पर टिप्पणी करने से पहले हमे उस विषय को पढ़ना चाहिए अन्यथा हम महज हँसी के पात्र बनकर रह जायेंगे।

और आप कभी ऐसे परिस्तिथि में ना फंसे इसलिए सनातन धर्म से जुड़ी कुछ परंपराओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आपके सामने प्रस्तुत कर रहे है ।

मन्दिरों में नंगे पाव जाना — वैसे तो कड़ कड़ में भगवान का बसेरा है फिर हमे पुजा करने के लिये मंदिर जाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? यह सवाल कई के मन में उबाल खाता होगा। बता दें कि प्राचीन समय सें मंदिरों की निर्माण ऐसे स्थान पर होने की मान्यता है जहाँ पृथ्वी के चुंबकीय और विद्युत क्षेत्र से सकारात्मक कंपन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है और इसी कारण से श्रद्धालुओं से नंगे पांव आने का अनुरोध होता है ताकि सरलता से उनका शरीर उन सकारात्मक विकिरण को सोख सके। पुरूषों को नंगी छाती और महिलाओं को अधिक से अधिक स्वर्ण आभूषण पहन कर आने का सुझाव दिया जाता है क्योकिं पुरुष के छाती के बाल सकारात्मक ऊर्जा को सोखने में सछम है और वही स्वर्ण आभूषण सकारात्मक ऊर्जा को सोखने में उत्तम है और एक अच्छा रेडियेटर है। यूँही नहीं मंदिर में जाने के पाश्र्चात हमें शांति का आभास होता है।

महिलाओं का बायां और पुरुषो का दायां हाथ की रेखा देखने की रीत — शरीर क्रिया विज्ञान फिजियोलाॅजी और न्यूरोलॉजी के अनुसार मस्तिष्क का दायां भाग व्यक्ति के बायें अंगों सहित बायां हाथ और हथेली का नियंत्रक होता है उसी प्रकार मस्तिष्क का बायां भाग दायां हथेली को नियंत्रित करता है। मस्तिष्क के दाहिने भाग में कल्पनाशीलता, संगीत ज्ञान, रचनात्मक आदि विशेषतायें हस्त रेखा विज्ञान के अनुसार व्यक्ति के बायें हथेली में संकेतित होती है और उसी तरह मस्तिष्क के बायें भाग में विचारात्मक शक्ति, तर्क शक्ति,लेखन आदि प्रक्टिकल फ़ील्ड गुण दायें हाथ पे संकेतित होती है । पहले की महिलायें गृहणी हुआ करती थी और गृह कार्य मे मशगूल रहती थी इसलिये उनका बायें हाथ की रेखा देखने का प्रावधान बना जबकी पुरुष बाहरी एवं व्यापार आदि काम में निहित थे इसलिये उनके दायें हाथ की रेखा देखी जाती थी।परंतु आज ऐसा नही है आज औरतों की कार्य क्षेत्र की सीमा सिमित नही है अतः अब बायें हाथ के साथ साथ महिलाओं का दायें हाथ की रेखा देखने का सुझाव भी विशेषज्ञों द्वारा दिया जाता है ।

मुंडन संस्कार की आवश्यकता —- 16 संस्कारो में से एक संस्कार है मुंडन संस्कार। बच्चा जब माँ की गर्भ में रहता है उसके सिर के कुछ रोम छिद्र बन्द हो जाते है और साथ ही कुछ बैक्टीरिया चिपक जाते है जो जन्म के बाद बच्चे को नहलाने मात्र से नही हटता ऐसे में जब बच्चे के सिर के बाल उस्तरे से उतारे जाते है तो उसके सारे रोम छिद्र खुल जाते है और सारी गन्दगी खत्म हो जाती है। मुन्डन के बाद शिशु के बाल सुंदर एवं घने निकलते हैं। यजुर्वेद के अनुसार यह संस्कार मानव के बौद्धिक, बल, आयु के विकास के लिए अती महत्वपूर्ण है।
अब आप सोच रहे होंगे कि जब ये इतना ही महत्वपूर्ण है तो जन्म के तुरंत बाद ही ये संस्कार क्यो नही हो जाता, दरअसल पैदा होने के एक साल तक बच्चा काफी सुकोमाल होता है अतः उस समय बच्चे के स्वास्थ पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है और कुछ अमंगल होने की भी आशंका होती है इसलिये जन्म के प्रथम, तृतीय, पंचम तथा सप्तम वर्ष में शिशु का मुंडन करने का विधान बना है ।
प्राचीन समय में सभी पढ़े लिखे न थे इसलिये ऋषी मुनियों ने धर्म के मार्ग को अपना कर प्रत्यके व्यक्ति को वैज्ञानिक जीवन जीने पे जोर दिया। और परंपराओं में बुना ये विज्ञान जीवन हमें विरासत में पीढी दर पीढी मिला आ रहा है। इसका अर्थ ये भी नही की हम हर बात पर विश्वास करे और अन्धविश्वासी बन जाये बल्कि ये तात्पर्य है कि हम अपने संस्कृति के पिछे की सच्चाई जाने उसपर विचार करे एवं समाज की उन्नति के लीये अपनी सही दिशा निर्देशित करें ।।

यूं ही नहीं बनी परम्पराएं आये जाने इनके वैज्ञनिक कारण

तेजस्विता उपाध्याय,मऊ।

आज के इस मॉडर्न समाज में वेदों में लिखी परम्पराएं और जन्म जनमान्तर से चली आ रही सभ्यता को एक झटके में अन्धविश्वास का नाम दे दिया जाता है। आज के समय में कई स्नातकधारी भी परम्पराओं के पिछे की असल वजह बिना जाने उसे निराधार कह देते है। फिर यही स्नातकधारी किसी विद्वान् के समक्ष पढ़ें लिखे गवांर की भांती परिचित होते है। किसी विषय पर टिप्पणी करने से पहले हमे उस विषय को पढ़ना चाहिए अन्यथा हम महज हँसी के पात्र बनकर रह जायेंगे।

और आप कभी ऐसे परिस्तिथि में ना फंसे इसलिए सनातन धर्म से जुड़ी कुछ परंपराओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आपके सामने प्रस्तुत कर रहे है ।

मन्दिरों में नंगे पाव जाना — वैसे तो कड़ कड़ में भगवान का बसेरा है फिर हमे पुजा करने के लिये मंदिर जाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? यह सवाल कई के मन में उबाल खाता होगा। बता दें कि प्राचीन समय सें मंदिरों की निर्माण ऐसे स्थान पर होने की मान्यता है जहाँ पृथ्वी के चुंबकीय और विद्युत क्षेत्र से सकारात्मक कंपन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है और इसी कारण से श्रद्धालुओं से नंगे पांव आने का अनुरोध होता है ताकि सरलता से उनका शरीर उन सकारात्मक विकिरण को सोख सके। पुरूषों को नंगी छाती और महिलाओं को अधिक से अधिक स्वर्ण आभूषण पहन कर आने का सुझाव दिया जाता है क्योकिं पुरुष के छाती के बाल सकारात्मक ऊर्जा को सोखने में सछम है और वही स्वर्ण आभूषण सकारात्मक ऊर्जा को सोखने में उत्तम है और एक अच्छा रेडियेटर है। यूँही नहीं मंदिर में जाने के पाश्र्चात हमें शांति का आभास होता है।

  • महिलाओं का बायां और पुरुषो का दायां हाथ की रेखा देखने की रीत — शरीर क्रिया विज्ञान फिजियोलाॅजी और न्यूरोलॉजी के अनुसार मस्तिष्क का दायां भाग व्यक्ति के बायें अंगों सहित बायां हाथ और हथेली का नियंत्रक होता है उसी प्रकार मस्तिष्क का बायां भाग दायां हथेली को नियंत्रित करता है। मस्तिष्क के दाहिने भाग में कल्पनाशीलता, संगीत ज्ञान, रचनात्मक आदि विशेषतायें हस्त रेखा विज्ञान के अनुसार व्यक्ति के बायें हथेली में संकेतित होती है और उसी तरह मस्तिष्क के बायें भाग में विचारात्मक शक्ति, तर्क शक्ति,लेखन आदि प्रक्टिकल फ़ील्ड गुण दायें हाथ पे संकेतित होती है । पहले की महिलायें गृहणी हुआ करती थी और गृह कार्य मे मशगूल रहती थी इसलिये उनका बायें हाथ की रेखा देखने का प्रावधान बना जबकी पुरुष बाहरी एवं व्यापार आदि काम में निहित थे इसलिये उनके दायें हाथ की रेखा देखी जाती थी।परंतु आज ऐसा नही है आज औरतों की कार्य क्षेत्र की सीमा सिमित नही है अतः अब बायें हाथ के साथ साथ महिलाओं का दायें हाथ की रेखा देखने का सुझाव भी विशेषज्ञों द्वारा दिया जाता है ।

मुंडन संस्कार की आवश्यकता —- 16 संस्कारो में से एक संस्कार है मुंडन संस्कार। बच्चा जब माँ की गर्भ में रहता है उसके सिर के कुछ रोम छिद्र बन्द हो जाते है और साथ ही कुछ बैक्टीरिया चिपक जाते है जो जन्म के बाद बच्चे को नहलाने मात्र से नही हटता ऐसे में जब बच्चे के सिर के बाल उस्तरे से उतारे जाते है तो उसके सारे रोम छिद्र खुल जाते है और सारी गन्दगी खत्म हो जाती है। मुन्डन के बाद शिशु के बाल सुंदर एवं घने निकलते हैं। यजुर्वेद के अनुसार यह संस्कार मानव के बौद्धिक, बल, आयु के विकास के लिए अती महत्वपूर्ण है।
अब आप सोच रहे होंगे कि जब ये इतना ही महत्वपूर्ण है तो जन्म के तुरंत बाद ही ये संस्कार क्यो नही हो जाता, दरअसल पैदा होने के एक साल तक बच्चा काफी सुकोमाल होता है अतः उस समय बच्चे के स्वास्थ पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है और कुछ अमंगल होने की भी आशंका होती है इसलिये जन्म के प्रथम, तृतीय, पंचम तथा सप्तम वर्ष में शिशु का मुंडन करने का विधान बना है ।
प्राचीन समय में सभी पढ़े लिखे न थे इसलिये ऋषी मुनियों ने धर्म के मार्ग को अपना कर प्रत्यके व्यक्ति को वैज्ञानिक जीवन जीने पे जोर दिया। और परंपराओं में बुना ये विज्ञान जीवन हमें विरासत में पीढी दर पीढी मिला आ रहा है। इसका अर्थ ये भी नही की हम हर बात पर विश्वास करे और अन्धविश्वासी बन जाये बल्कि ये तात्पर्य है कि हम अपने संस्कृति के पिछे की सच्चाई जाने उसपर विचार करे एवं समाज की उन्नति के लीये अपनी सही दिशा निर्देशित करें ।।

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