पद्मश्री सम्मानित कवि हलधर नाग: जिनका अनुभव डिग्री पर भारी पड़ गया

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पद्मश्री सम्मानित कवि
  • वर्ष 1950 में ओडिशा के बारगढ़ के गरीब घर में हलधर नाग का जन्म हुआ था। बचपन में ही पिता का साया सर से उठ गया जिसके बाद मजबूरन उन्हें अपनी पढ़ाई तीसरी कक्षा में ही छोडनी पड़ी। हलधर नाग के बारें मे किसी ने कभी सोचा न था की इस दूसरी पास लड़के का लिखा काव्य विश्वविद्यालय का पाट्यक्रम होगा।

कवि हलधर नाग की कोसली भाषा की कविता पाँच विद्वानों के पीएचडी अनुसंधान का विषय है। इसके अलावा, संभलपुर विश्वविद्यालय इनके सभी लेखन कार्य को हलधर ग्रंथाबली -2 नामक एक पुस्तक के रूप में अपने पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर चुकी है। नाग जी ने अपनी पहली कविता लिखी और जो एक अख़बार मे प्रकाशित हुई फिर उन्होनें 4 और कविताएं उस अखबार में दी और सभी प्रकाशित हुई, उनकी कविताएं लोगों को बहुत पसंद आयी और फिर वो कविताएं लिखने के इस क्रम को जारी रखा और उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, उनके द्वारा लिखी हुई सारी कवितायेँ और 20 महाकाव्य उनको कंठस्थ याद हैँ, ये भी उनकी एक अनोखी कला है.
पिता के मृत्यु के बाद घर पर तंगहाली थी जिसके कारण पेट भरने के लिए उन्होनें मिठाई की दुकान पर बरतन धुलने का काम किया फिर एक स्कूल मे काम करने लगे, इसके बाद इन्होने स्टेशनरी खोली ताकि गाँव के बच्चों को पढ़ने की सहूलियत मिल सके, और खुद भी पढ़ते रहे क्यूंकि उनको पढ़ने का बहुत शौक है। 2016 मे उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पदमश्री का सम्मान दिया गया। वो आज भी जगह जगह जाकर अपना काव्यपाठ करते हैं और श्रोताओं की सरहना पाते हैं।
वो हर किसी के लिये प्रेरणास्रोत हैँ, उनकी काबलियत और अनुभव के आगे सारी डिग्री कम हैँ, सोचिये की इस आदमी का क्या ओहदा है की तीसरी कक्षा पास होने पे भी लोग उनपे पीएचडी कर रहे हैँ।
कवि हलधर कहतें हैं कि “वैसे तो हर कोई कवि है पर कुछ लोगों के पास ही उनको आकर देने की कला होती है”

पद्मश्री सम्मानित कवि हलधर नाग: जिनका अनुभव डिग्री पर भारी पड़ गया

वर्ष 1950 में ओडिशा के बारगढ़ के गरीब घर में हलधर नाग का जन्म हुआ था। बचपन में ही पिता का साया सर से उठ गया जिसके बाद मजबूरन उन्हें अपनी पढ़ाई तीसरी कक्षा में ही छोडनी पड़ी। हलधर नाग के बारें मे किसी ने कभी सोचा न था की इस दूसरी पास लड़के का लिखा काव्य विश्वविद्यालय का पाट्यक्रम होगा।
कवि हलधर नाग की कोसली भाषा की कविता पाँच विद्वानों के पीएचडी अनुसंधान का विषय है। इसके अलावा, संभलपुर विश्वविद्यालय इनके सभी लेखन कार्य को हलधर ग्रंथाबली -2 नामक एक पुस्तक के रूप में अपने पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर चुकी है। नाग जी ने अपनी पहली कविता लिखी और जो एक अख़बार मे प्रकाशित हुई फिर उन्होनें 4 और कविताएं उस अखबार में दी और सभी प्रकाशित हुई, उनकी कविताएं लोगों को बहुत पसंद आयी और फिर वो कविताएं लिखने के इस क्रम को जारी रखा और उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, उनके द्वारा लिखी हुई सारी कवितायेँ और 20 महाकाव्य उनको कंठस्थ याद हैँ, ये भी उनकी एक अनोखी कला है.
पिता के मृत्यु के बाद घर पर तंगहाली थी जिसके कारण पेट भरने के लिए उन्होनें मिठाई की दुकान पर बरतन धुलने का काम किया फिर एक स्कूल मे काम करने लगे, इसके बाद इन्होने स्टेशनरी खोली ताकि गाँव के बच्चों को पढ़ने की सहूलियत मिल सके, और खुद भी पढ़ते रहे क्यूंकि उनको पढ़ने का बहुत शौक है। 2016 मे उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पदमश्री का सम्मान दिया गया। वो आज भी जगह जगह जाकर अपना काव्यपाठ करते हैं और श्रोताओं की सरहना पाते हैं।
वो हर किसी के लिये प्रेरणास्रोत हैँ, उनकी काबलियत और अनुभव के आगे सारी डिग्री कम हैँ, सोचिये की इस आदमी का क्या ओहदा है की तीसरी कक्षा पास होने पे भी लोग उनपे पीएचडी कर रहे हैँ।
कवि हलधर कहतें हैं कि “वैसे तो हर कोई कवि है पर कुछ लोगों के पास ही उनको आकर देने की कला होती है”

तेजस्विता उपाध्याय, मऊ

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